1 Tegul

Essay On Advertising In Hindi

Here is an essay on the ‘Business Economist’ for class 9, 10, 11 and 12. Find paragraphs, long and short essays on the ‘Business Economist’ especially written for school and college students in Hindi language.

Essay on Business Economist


Essay Contents:
  1. व्यावसायिक अर्थशास्त्री का अर्थ  (Meaning of Business Economist)
  2. व्यावसायिक अर्थशास्त्री के कार्य (Functions of Business Economist)
  3. व्यावसायिक अर्थशास्त्री के कर्त्तव्य (Duties of a Business Economist)
  4. व्यावसायिक अर्थशास्त्री के उत्तरदायित्व (Responsibilities of a Business Economist)
  5. व्यावसायिक अर्थशास्त्री की भूमिका एवं महत्व (Role and Importance of Business Economist)


Essay # 1. व्यावसायिक अर्थशास्त्री का अर्थ  (Meaning of Business Economist):

शब्दार्थ में व्यावसायिक अर्थशास्त्र के ज्ञाता को व्यावसायिक अर्थशास्त्री कहते हैं लेकिन इस परिभाषा से व्यावसायिक अर्थशास्त्री के कार्य और उसके दायित्वों का पूरा ज्ञान नहीं होता है । वस्तुतः एक व्यावसायिक अर्थशास्त्री किसी संस्था का वह अधिकारी होता है जो कि सर्वोच्च प्रबन्ध को आर्थिक मामलों पर परामर्श देने हेतु नियुक्त किया जाता है ।

प्रबन्ध के ज्ञान की आवश्यकता विभिन्न देशों में बढ़ती जा रही है जिसके कारण विभिन्न व्यावसायिक एवं गैर-व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में प्रबन्धकीय दक्षता रखने वाले अर्थशास्त्रियों का महत्व एवं दायित्व बढ़ रहा है ।

प्रबन्धकीय दक्षता रखने वाला अर्थशास्त्री अपने विशेष ज्ञान के द्वारा सही निर्णयन एवं भावी नियोजन की जटिल समस्याओं को हल कर सकता है । अतः जो व्यक्ति निर्णयन (Decision-Making) तथा भावी नियोजन (Forward Planning) के निर्माण में मदद करता है, ‘व्यावसायिक अर्थशास्त्री’ कहलाता है ।

प्रबन्ध का एक महत्वपूर्ण कार्य निर्णय लेना है तथा निर्णय को सही रूप में क्रियान्वित करने में मदद करना है । पीटर ड्रकर के अनुसार, ”प्रबन्धक जो कुछ भी करता है, निर्णयों के द्वारा ही करता है ।” यह सभी जानते हैं कि प्रबन्धकों को दिन-प्रतिदिन अनेक कार्य करने पड़ते हैं और इन कार्यों को करने के लिए उनके पास अनेक विकल्प होते हैं ।

इन विकल्पों में से सर्वोत्तम विकल्प कौन-सा है ? इसको निश्चित करना ही ‘निर्णयन’ है । टैरी ने इस सम्बन्ध में यह कहा है कि ”प्रयम्बकों का जीवन ही निर्णय लेना है ।” इन्होंने आगे कहा है कि ”यदि प्रबन्धक की कोई सार्वभौमिक पहचान है, तो वह उसका निर्णय लेना । निर्णय प्रबन्ध के सभी कार्यों – नियोजन, संगठन, निर्देशन, नियन्त्रण आदि के अन्तर्गत सम्मिलित है ।”

साइमन का यह विचार कि ‘निर्णय लेना’ ही प्रबन्ध है, बहुत उचित प्रतीत होता है । साइमन के विचार से कोई सहमत हो अथवा न हो परन्तु यह निर्विवाद सत्य है कि निर्णय ही व्यवसाय का मुख्य आधार है । आज निर्णय का महत्व इसलिए और भी बढ़ गया है, क्योंकि प्रबन्धकों की क्षमता एवं सफलता का माप उनके द्वारा लिये गये निर्णयों से ही निश्चित होता है ।

निर्णय लेने में और भविष्य के लिए नियोजन करने में व्यावसायिक अर्थशास्त्री नियुक्त किये जाते हैं और उनकी सेवाएँ निर्णयकर्ता को उपलब्ध करायी जाती हैं । विकसित राष्ट्रों में व्यावसायिक अर्थशास्त्री को एक पेशेवर व्यक्ति माना जाता है । अपने देश में भी व्यावसायिक अर्थशास्त्री की आवश्यकता को समझा जाने लगा है । व्यावसायिक अर्थशास्त्री की उपयोगिता निरन्तर बढ़ती जा रही है ।


Essay # 2. व्यावसायिक अर्थशास्त्री के कार्य (Functions of Business Economist):

व्यावसायिक अर्थशास्त्री किसी व्यावसायिक संस्था का एक महत्वपूर्ण अधिकारी होता है ।

व्यावसायिक अर्थशास्त्री के कार्यों को दो स्तरों पर विभक्त किया जा सकता है:

I. बौद्धिक कार्य

II. चयन कार्य

दोनों कार्यों की व्याख्या नीचे दी गयी है:

I. बौद्धिक कार्य (Thinking Functions):

(i) समस्या की जानकारी करना ।

(ii) समस्या के सभी पहलुओं का अध्ययन करना ।

(iii) समस्या का सरल रूप में प्रस्तुतीकरण करना ।

(iv) समस्या के हल का उपयुक्त समय निर्धारित करना ।

(1) संकल्पन (Conception):

समस्या के सम्बन्ध में हुए प्रत्यक्ष ज्ञान से विचारों का विकास इस अवस्था में होता है ।

इस स्थिति में निम्न कार्य आते हैं:

(i) समस्या हल के विभिन्न विकल्पों को सोचना, तथा

(ii) विभिन्न विकल्पों का मूल्यांकन करना ।

(2) खोज (Investigation):

विकसित विचारों के सम्बन्ध में तथ्यों का अन्वेषण किया जाता है । समस्या की जानकारी के बाद उसके हल के लिए साधन खोजे जाते हैं ।

इस प्रक्रिया में निम्न कार्य आते हैं:

(i) समस्या हल के लिए साधनों की खोज करना, तथा

(ii) समस्या के हल में आने वाली रुकावटों का पता लगाना ।

II. चयन कार्य (Selection Functions):

समस्या पर गम्भीरतापूर्वक विचार करने के बाद एक व्यावसायिक अर्थशास्त्री उसके समाधान के लिए सर्वोत्तम विकल्प का चयन करता है । किसी भी समस्या को हल करने के लिए बहुत-से तरीके हो सकते हैं लेकिन समस्या का समाधान अल्प साधनों में शीघ्र हो जाये, ऐसा विकल्प चुनना व्यावसायिक अर्थशास्त्री का बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य है ।

फिर समस्या का समाधान ऐसा हो जो सम्बन्धित सभी पक्षों के अनुकूल हो । कोई भी पक्ष उसका विरोध न करे ऐसा और भी कठिन हो जाता है । उदाहरण के लिए, संस्था की समस्या ‘उत्पादन बढ़ाने’ की है । उत्पादन बढ़ाने के दो विकल्प हो सकते हैं ।

पहला, मशीनीकरण द्वारा; तथा दूसरा, अधिक श्रमिक लगाकर । यदि पहले विकल्प का चयन किया जाय तो मालिक इसका समर्थन करेंगे क्योंकि लागत कम होगी तथा उत्पादन बढ़ेगा लेकिन श्रमिक वर्ग इसका विरोध करेगा क्योंकि इससे बेरोजगारी बढ़ेगी ।

दूसरे विकल्प का श्रमिक समर्थन करेंगे लेकिन मालिक विरोध कर सकते हैं, यदि उत्पादन वृद्धि के साथ लागत में भी वृद्धि होती है । अतः व्यावसायिक अर्थशास्त्री को ऐसे किल्प को चुनना है जिसमें न तो लागत बढ़े और न ही बेरोजगारी बढ़े । यदि ऐसा करने में वह सफल हो जाता है तो वह एक कुशल अर्थशास्त्री माना जायेगा । समाज में उसका स्तर आदर की दृष्टि से देखा जायेगा ।

उपर्युक्त कार्यों के अतिरिक्त वर्तमान में बहुत-से विद्वानों ने व्यावसायिक अर्थशास्त्री के कुछ और विशेष कार्यों को तीन भागों में बाँटा है:

विशिष्ट कार्य (Specific Functions):

व्यावसायिक अर्थशास्त्री के कुछ विशिष्ट कार्य होते हैं ।

श्री एच. आई. एन्साफ (H. I. Ansoff) ने विशिष्ट कार्यों को तीन भागों में बाँटा है:

(1) व्यूह-रचना सम्बन्धी कार्य (Strategic Functions):

व्यावसायिक अर्थशास्त्री को इन कार्यों के अन्तर्गत संगठन के उद्देश्यों की पूर्ति, साधनों के उपयोग हेतु दीर्घकालीन योजनाओं का निर्माण तथा उपलब्ध अवसरों और बाहरी वातावरण के कारण उत्पन्न रुकावटों के अनुरूप अपने साधनों को समायोजित करने का प्रयास करना पड़ता है ।

(2) प्रशासन सम्बन्धी कार्य (Administrative Functions):

इन कार्यों के अन्तर्गत संगठन के ढाँचे में सुधार करने, अधिकार एवं उत्तरदायित्व में समन्वय, प्रभावपूर्ण संचार व्यवस्था तथा साधनों को जुटाने सम्बन्धी निर्णय लेने पड़ते हैं ।

(3) कार्य-संचालन सम्बन्धी कार्य (Operating Functions):

कार्यात्मक निर्णयों में दैनिक या प्रतिदिन से सम्बन्धित निर्णय होते हैं । ये निर्णय भी दो प्रकार के होते हैं । पहले, दैनिक होते हैं जो व्यवसाय की सामान्य प्रकृति में लिये जाते हैं तथा इनके लिए कम सोच-विचार की आवश्यकता होती है । दूसरे, निर्णय आधारभूत होते हैं जो कि काफी सोच-विचार के पश्चात् लिये जाते हैं ।

अतः एक व्यावसायिक अर्थशास्त्री का कार्य-क्षेत्र काफी व्यापक होता है । वह समुचित सांख्यिकी अभिलेख भी तैयार करता है ।

इंग्लैण्ड में व्यावसायिक अर्थशास्त्री के विशिष्ट कार्यों का सर्वेक्षण करने के बाद सर्वश्री के. जे. डब्ल्यू. एलैक्जेण्डर तथा एलैक्जेण्डर जी. केम्प ने निम्नांकित कार्यों को प्रतिपादित किया है:

(1) विक्रय पूर्वानुमान (Sales Forecasting)

(2) औद्योगिक बाजार शोध (Industrial Market Research)

(3) प्रतियोगी फर्मों का आर्थिक विश्लेषण (Economic Analysis of Competitive Companies)

(4) उद्योग की मूल्य समस्याएँ (Pricing Problems of Industry)

(5) पूँजीगत परियोजनाएँ (Capital Projects)

(6) उत्पादन कार्यक्रम बनाना (Production Programming)

(7) प्रतिभूति, विनियोग, विश्लेषण तथा पूर्वानुमान (Security, Investment, Analysis and Forecasting)

(8) व्यापार और जन-सम्पर्क सम्बन्धी सलाह देना (Advice on Trade and Public Relations)

(9) कच्चे माल के सम्बन्ध में सलाह देना (Advising on Primary Commodities)

(10) विदेशी विनिमय के सम्बन्ध में सलाह देना (Advising on Foreign Exchanging)

(11) कृषि का आर्थिक विश्लेषण (Economic Analysis of Agriculture)

(12) अल्प-विकसित अर्थव्यवस्थाओं का विश्लेषण करना (Analysing Under-Developed Economies), तथा

(13) वातावरण सम्बन्धी पूर्वानुमान लगाना (Environmental Forecasting) |

इन कार्यों को देखने से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि व्यावसायिक अर्थशास्त्री का कार्य-क्षेत्र इन विद्वानों ने बहुत ही व्यापक बना दिया है ।

पीटर ड्रकर ने विकल्पों का चयन करने के लिए कुछ आधार बताये हैं । उन आधारों के अनुसार एक व्यावसायिक अर्थशास्त्री विशिष्ट कार्य साधनों में मितव्ययिता तथा हानि की जोखिमों को कम करता है ।

इस प्रकार एक व्यावसायिक अर्थशास्त्री के कार्य बहुत व्यापक हैं, वह उद्योगों तथा व्यावसायिक संस्थानों के लिए ही कार्य नहीं करता, बल्कि समाज एवं सरकार को भी अपने व्यावहारिक ज्ञान द्वारा आर्थिक समस्याओं के हल हेतु सुझाव देता है तथा उनको क्रियान्वयन में मदद करता है ।


Essay # 3. व्यावसायिक अर्थशास्त्री के कर्त्तव्य (
Duties of a Business Economist):

एक व्यावसायिक अर्थशास्त्री का मुख्य कर्त्तव्य विभिन्न दायित्वों का निभाना है ।

विभिन्न पक्षों के प्रति व्यावसायिक अर्थशास्त्री के कर्त्तव्य निम्नलिखित हैं:

(1) उद्देश्यों का निर्धारण (Setting of Objectives):

व्यावसायिक अर्थशास्त्री को अपने कर्त्तव्यों के सम्बन्ध में यह जानना व समझना आवश्यक है कि समस्या को सुलझाने के लिए उसे किस क्रम को अपनाना है । सर्वप्रथम तो उसे उद्देश्यों का निर्धारण करना पड़ेगा । किसी भी संस्था के कुछ उद्देश्य होते हैं जिन्हें पूर्ण करना संस्था की सफलता माना जाता है ।

समय तथा साधनों की कमी के कारण सभी उद्देश्यों की पूर्ति नहीं हो पाती । अतः प्राथमिकता का निर्धारण करना व्यावसायिक अर्थशास्त्री का सबसे पहला कर्तव्य है । इस कर्त्तव्य के निर्वाह पर ही उसकी आगे की सफलता निर्भर है ।

(2) समस्या का विश्लेषण (Analysing the Problem):

वसायिक अर्थशास्त्री का कर्तव्य है कि वह समस्या का विश्लेषण करे और उसे समझे, इससे समस्या के हल में आसानी होती है । अतः समस्या के विश्लेषण के अन्तर्गत सम्बन्धित तथ्यों को भी एकत्रित करना पड़ता है ।

(3) व्यापारिक जोखिमों को कम करना (To Reduce the Risk of Business):

व्यावसायिक अर्थशास्त्री का सबसे पहला कर्त्तव्य है कि वह अपनी योग्यता से व्यापारिक जोखिमों को कम करे । व्यापार में निहित जोखिमों को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता क्योंकि वह कोई भी व्यापार अनिश्चितता के वातावरण में चलता है । अनिश्चितता के साथ जोखिम अनिवार्य है ।

व्यावसायिक जोखिमें भी प्राय, दो प्रकार की होती हैं । एक तो वे जिनका बीमा कराके स्वयं प्रबन्धक ही जोखिमों को हटा सकता है । उदाहरण के लिए, उद्योग में आग लग जाने वाली जोखिम, कच्चे माल या निर्मित माल की चोरी होने की जोखिम तथा श्रमिकों के मशीनों पर कार्य करते हुए दुर्घटनाग्रस्त होने वाली जोखिम, आदि ।

इन जोखिमों को बीमा कराके टाला जा सकता है । दूसरी जोखिम वे होती हैं जिनका बीमा नहीं कराया जा सकता । उदाहरण के लिए, बाजार में कीमतों के कम होने का भय या व्यापार चक्र, आदि की सम्भावना ।

(4) प्रयासों में मितव्ययिता (Economy in Efforts):

व्यावसायिक अर्थशास्त्री का यह भी कर्त्तव्य है कि वह विकल्पों का मूल्यांकन करते समय इस बात को ध्यान में रखे कि कौन-सा विकल्प कम-से-कम प्रयासों के सर्वश्रेष्ठ परिणाम प्राप्त करा सकता है । किसी कार्य को करने में जितने कम साधन लगेगें उतनी ही लाभ-दर बढ़ेगी ।

(5) कार्य-निष्पादन में समय की बचत (Economy in Performance of Jobs):

व्यावसायिक अर्थशास्त्री को चाहिए कि वह विकल्पों में मूल्यांकन करते समय इस बात को ध्यान में रखे कि कौन-से विकल्प से कम समय लगता है । प्रबन्धकों के समक्ष कई बार इस प्रकार की परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं और उनको अति शीघ्र निर्णय कर लेना पड़ता है ।

अतः समय का तत्व बहुत ही महत्वपूर्ण हो जाता है । कार्य-निष्पादन में समय की जितनी बचत होगी, कार्य-कुशलता उतनी ही अधिक बढ़ेगी ।

(6) कार्य-निष्पादन में समय की बचत (Achievement of Objects in Limited Means):

व्यावसायिक अर्थशास्त्री को प्रबन्ध विज्ञान में सफलता तभी मिलेगी, जब कि वह कोई भी परामर्श देते समय इस तथ्य का ध्यान रखे कि साधन सीमित हैं । सीमित साधनों से ही लक्ष्य की प्राप्ति करनी है । अतः कार्य-निष्पादन का ऐसा तरीका होना चाहिए जिसमें साधन कम से कम लगें । सीमित साधनों की वजह से व्यावसायिक कार्य-कलापों में रुकावट नहीं आनी चाहिए ।

(7) सर्वश्रेष्ठ विकल्प का चयन (Selection of Best Alternative):

नीति-निर्धारण के विभिन्न विकल्पों को निश्चित करने के बाद निर्णयन प्रक्रिया का अगला चरण उन विकल्पों में से किसी एक सर्वश्रेष्ठ विकल्प का चुनाव करता है । व्यावसायिक अर्थशास्त्री का कर्त्तव्य है कि वह अपने अनुभव, प्रयोग, शोध एवं विश्लेषण, आदि के द्वारा सर्वश्रेष्ठ विकल्प का चुनाव करे ।

व्यावसायिक अर्थशास्त्री को यह भी चाहिए कि वह विकल्प का चयन करते समय वास्तविकता को ध्यान में रखे । केवल काल्पनिक परिस्थितियों में लिए गये निर्णय सही नहीं होते, अतः सिद्धान्तों से अधिक व्यावहारिकता के पहलू पर ध्यान देना चाहिए ।

(8) निर्णय का क्रियान्वयन (Implementing the Decision):

जब किसी समस्या के समाधान के लिए कोई निर्णय ले लिया जाता है तो अगला चरण उसको कार्यरूप प्रदान करना है । व्यावसायिक अर्थशास्त्री को इस प्रकार के प्रयास करने चाहिए कि चुनी हुई कार्य-विधि सुचारू रूप से लागू की जा सके ।

क्रियान्वयन के अन्तर्गत कर्मचारियों को कार्य करने के लिए उत्प्रेरित करना, समन्वय स्थापित करना तथा नियन्त्रण, आदि से सम्बन्धित नीतियों का निर्धारण करना आदि आते हैं ।

अतः व्यावसायिक अर्थशास्त्री के कर्त्तव्यों को निम्न दो भागों में रखा जा सकता है:

I. प्रबन्ध के प्रति कर्त्तव्य (Duties for Management):

व्यावसायिक अर्थशास्त्री का कर्त्तव्य है कि वह प्रबन्धकों की महत्वपूर्ण निर्णय लेने में सहायता करे ।

अतः प्रबन्ध के उसके प्रमुख कर्तव्य निम्नलिखित हैं:

1. व्यूह-रचना सम्बन्धी निर्णयों में मदद (To Help in Taking Strategic Decisions),

2. प्रशासन सम्बन्धी निर्णयों में मदद (To Help in Administrative Decisions),

3. कार्य-संचालन सम्बन्धी निर्णयों में मदद (To Help in Operating Decisions),

4. भावी योजनाओं के निर्माण में मदद (To Help in Formulation of Forward Planning),

5. अनिश्चितताओं को कम करने में मदद (To Help in Minimising of Uncertainties),

6. विकास एवं सुधार में मदद (To Help in Growth and Improvement),

7. परिवर्तन का सामना करने के लिए योग्यता में सुधार लाने में मदद (To Help in Improving the Ability to Cope with Change),

8. प्रबन्ध में भविष्य के प्रति विचार करने की प्रकृति को जागृत करने में मदद (To Help in Increasing Forward Looking Attitude in Management),

9. कार्य-संचालन की कुशल पद्धतियों का विकास करने में मदद (To Help in Developing Efficient Methods),

10. उद्देश्यों को प्राप्त करने में मदद (To Help in Achieving of Objects), तथा

11. आर्थिक मामलों पर प्रबन्धकों के भाषण तैयार करने में सहायता करना ।

II. समाज एवं राष्ट्र के प्रति कर्त्तव्य (Duties for Society and Nation):

एक व्यावसायिक अर्थशास्त्री के कर्त्तव्य वर्तमान समय में समाज एवं राष्ट्र के प्रति बढ़ते जा रहे हैं । समाज के अन्तर्गत उपभोक्ता तथा कर्मचारी, आदि आ जाते हैं । ये दोनों मिलकर एक समाज का बहुत बड़ा भाग हैं ।

प्रमुख रूप से इन कर्त्तव्यों के अन्तर्गत निम्नलिखित का समावेश किया जाता है:

(1) कर्मचारियों के लाभ एवं कल्याणकारी योजनाओं को बनाने में मदद (To Help in Making of Schemes for Employee’s Benefit and Welfare)

(2) प्रेरणात्मक मजदूरी पद्धतियों को लागू कराने में मदद (To Help in Implementing of Incentive Wage Plans)

(3) उत्पादित माल की निरन्तर पूर्ति कराने में मदद (To Help in Continuous Supply of the Products)

(4) कालाबाजारी रोकने में मदद (To Help in Checking of Black Marketing)

(5) रोजगार के अवसर बढ़ाने वाली योजनाओं को प्रोत्साहित करने में मदद (To Help in Promoting Employment Providing Schemes)

(6) आर्थिक विकास में सरकार को मदद (To Help the Government in Economic Development),

(7) करों की चोरी रोकने में सरकार को मदद (To Help the Government in Checking of Tax-Evasion)

(8) आर्थिक साधनों का अधिकतम विदोहन करने में मदद (To Help in Maximum Utilization of Economic Resources)

(9) आर्थिक समस्याओं पर अपने विचार रखना व सुझाव देना (Giving Suggestions on Economic Problems) तथा

(10) मालिकों व कर्मचारियों में अच्छे सम्बन्ध विकसित करना (Developing Good Relation between Employer and Employees)


Essay # 4. व्यावसायिक अर्थशास्त्री के उत्तरदायित्व (
Responsibilities of a Business Economist):

व्यावसायिक अर्थशास्त्री के कार्यों एवं कर्त्तव्यों का अध्ययन करने के बाद उसके उत्तरदायित्वों की जानकारी होनी आवश्यक है । उत्तरदायित्वों के प्रति सचेत रहना व्यावसायिक अर्थशास्त्री के लिए परम आवश्यक है ।

उसे अपना उत्तरदायित्वों निभाने हेतु निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिए:

(1) उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए साधनों को जुटाना (Acquiring of Resources for the Attainment of Objectives):

उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए साधनों को जुटा कर उन्हें निश्चित समय के अन्दर प्राप्त करने का प्रमुख उत्तरदायित्व है ।

(2) विनियोजित पूँजी पर उचित लाभ-दर को कायम रखना (To Maintain Reasonable Rate of Profit on Invested Capital):

व्यावसायिक अर्थशास्त्री को सदैव यह देखना होगा कि व्यवसाय में लगी पूँजी पर लाभ-दर बढ़ती रहे । अतः उसका उत्तरदायित्व है कि वह प्रबन्धक को लाभ-दर में वृद्धि के लिए उपायों को बताता रहे । यदि लाभ-दर घटने की कोई भी आशंका है तो उससे बचने के लिए उपायों का सुझाव देना चाहिए ।

(3) आर्थिक सूचनाओं के स्रोतों का ज्ञान तथा विशेषज्ञों से सम्पर्क (Knowledge of Sources of Information and Contacts with Experts):

व्यावसायिक अर्थशास्त्री को अपने कर्त्तव्यों को निभाने के लिए उन सभी स्रोतों को जानना होगा जिनके आधार पर आर्थिक घटनाओं की जानकारी हो सके तथा उन विशेषज्ञों से सम्पर्क स्थापित करना पड़ेगा जो उसको उद्देश्य पूर्ति के लिए उचित एवं सही सलाह दे सकें । हर व्यक्ति हर चीज का ज्ञाता नहीं हो सकता; अतः विभिन्न क्षेत्र के विशेषज्ञों से उसको सम्पर्क रखना पड़ेगा ।

(4) निर्णय-प्रक्रिया निर्धारित करना (To Develop the Decision-Making Process):

प्रबन्ध को दिन-प्रतिदिन निर्णय लेने पड़ते हैं अतः व्यावसायिक अर्थशास्त्री का यह उत्तरदायित्व है कि वह निर्णयों के लिए एक ऐसी प्रक्रिया निर्धारित करे जिससे प्रबन्ध स्वयं निर्णय ले सके ।

बहुत-सी ऐसी घटनाएँ होती है जिसमें शीघ्र निर्णय लेना पड़ता है तथा व्यावसायिक अर्थशास्त्री से सम्पर्क या राय लेने का समय नहीं मिल पाता है । ऐसी परिस्थितियों में यदि निर्णय प्रक्रिया से प्रबन्ध को अवगत करा दिया जाये तो कार्य बहुत अधिक आसान हो जाता है ।

(5) सफल पूर्वानुमान (Successful Forecast):

व्यावसायिक अर्थशास्त्री का पूर्वानुमान के सम्बन्ध में उत्तरदायित्व बहुत अधिक है । किसी भी योजना या निर्णय की सफलता इस बात में निहित है कि पूर्वानुमान कितना सही होता है । अतः पूर्वानुमान लगाने में उसे उन सभी सांख्यिकी, गणितीय तथा आधुनिक तकनीकों को लगाना चाहिए जो भविष्य को स्पष्ट बना सकें ।

(6) त्रुटियों के प्रति प्रबन्ध को सचेत करना (Warning the Management for Errors in Prediction):

व्यावसायिक अर्थशास्त्री का यह उत्तरदायित्व है कि वह प्रबन्ध को उन सब त्रुटियों के प्रति शीघ्र ही सचेत कर दे जो पूर्वानुमान लगाने में हो गयी हैं । ऐसा करके वह संस्था को हानि से बचा सकता है । अतः गलतियों को मानकर उसमें सुधार लाना हर व्यक्ति का उत्तरदायित्व है ।

(7) प्रतिपुष्टि तथा नियन्त्रण (Feedback and Control):

जब किसी निर्णय को कार्य-रूप दिया जाता है तो व्यावसायिक अर्थशास्त्री का यह उत्तरदायित्व हो जाता है कि वह उन निर्णयों के प्रभावों का मूल्यांकन करे तथा सूचनाओं तथा कड़ी के माध्यम से उन पर पूर्ण नियन्त्रण करके निर्णयन-प्रक्रिया को चालू रखे ।

(8) प्रभावपूर्ण समन्वय (Effective Co-Ordination):

एक व्यावसायिक अर्थशास्त्री का उत्तरदायित्व नीतियों के निर्धारण तथा उसको कार्यरूप देने में होता है । यह तभी सम्भव हो सकता है जबकि वह नीतियों के निर्माण तथा उनके क्रियान्वयन में ताल-मेल बैठा सके ।

इसके लिए उसे प्रभावपूर्ण समन्वय प्रणालियों को अपनाना पड़ेगा । समन्वय उच्चस्तरीय प्रबन्ध से लेकर निम्न स्तर तक स्थापित करना पड़ेगा तथा प्रबन्ध एवं कर्मचारियों के मध्य प्रभावपूर्ण संचार व्यवस्था स्थापित करनी होगी ।

अतः व्यावसायिक अर्थशास्त्री का वर्तमान युग में महत्वपूर्ण योगदान है । उसकी भूमिका आर्थिक एवं व्यावसायिक जगत में बढ़ती जा रही है । वह अपने दायित्वों को कितनी सफलता से निभा पाता है, इस बात पर उसका भविष्य निर्भर है ।

उसके कार्यक्षेत्र से आशा तो यही है कि व्यावसायिक कार्यों में उसका योगदान तब तक रहेगा जब तक कि अनिश्चितता का वातावरण समाप्त नहीं हो जाता । व्यापार में अनिश्चितता को कम तो किया जा सकता है लेकिन समाप्त नहीं किया जा सकता । अतः व्यावसायिक अर्थशास्त्री प्रबन्ध-तन्त्र का एक आवश्यक अंग है । वह अनिश्चितता के मध्य निर्णय लेने में मदद करता है ।


Essay # 5. व्यावसायिक अर्थशास्त्री की भूमिका एवं महत्व (Role and Importance of Business Economist):

आज के व्यवसाय जगत में व्यावसायिक अर्थशास्त्रियों का महत्व बढ़ता ही जा रहा है ।

प्रबन्ध की ऐसी बहुत-सी समस्याएँ है जिनका हल अर्थशास्त्र के सिद्धान्तों के द्वारा किया जा सकता है । उदाहरण के लिए, उत्पादन की मात्रा या इकाई का अनुकूलतम आकार निर्धारित करने के लिए हमको उत्पादन के नियम (Laws of Return) की मदद लेनी पड़ती है ।

मूल्य-निर्धारण में माँग की लोच (Elasticity of Demand), माँग का नियम (Laws of Demand), उपभोक्ता की बचत (Consumer Surplus), सीमान्त उपयोगिता के सिद्धान्त (Theory of Marginal Utility), आदि का सहारा लेना पड़ता है ।

इसी प्रकार व्यवसाय की लाभ-देय क्षमता निर्धारित करने में जोखिम का सिद्धान्त (Risk Theory of Profit), अनिश्चितता वहन करने का सिद्धान्त (Uncertainty-Bearing Theory), सीमान्त उत्पादकता का सिद्धान्त (Modern Theory of Profit), आदि का विश्लेषण करना पड़ता है ।

अतः व्यावसायिक समस्याओं के हल के लिए अर्थशास्त्र का ज्ञान आवश्यक है । व्यवसाय जगत में व्यावसायिक अर्थशास्त्रियों की भूमिका इसीलिए बढ़ती जा रही है । एक कुशल एवं योग्य व्यावसायिक अर्थशास्त्री अनिश्चितताओं का पूर्वानुमान लगाकर जोखिमों को कम कर सकता है ।

व्यावसायिक अर्थशास्त्री का एक दायित्व यह भी है कि वह प्रबन्धकीय निर्णयों को प्रभावित करने वाले तत्वों को निश्चित करे और उसके लिए अपने सुझाव दे, इसीलिए उसका महत्व और भी अधिक हो गया है ।

निर्णयों को प्रभावित करने वाले घटकों को दो भागों में बाँटा जा सकता है:

a. आन्तरिक घटक (Internal Factors):

आन्तरिक घटक वे होते हैं जो प्रबन्धकों के नियन्त्रण में होते हैं या जो फर्म के कार्य-क्षेत्र के अन्तर्गत आते हैं । उदाहरण के लिए, कोई भी फर्म या संस्था इस बात के लिए स्वतन्त्र है कि वह कितनी पूँजी विनियोजित करे, कहाँ विनियोजित करे, कितने श्रमिकों को लगाये, उत्पादित वस्तुओं को किस प्रकार तथा कहाँ बेचे, वस्तु का मूल्य क्या निर्धारित करे, आदि ।

एक व्यावसायिक अर्थशास्त्री इन मामलों पर प्रबन्धकों को अपना मत देकर सही निर्णय लेने में सहायता प्रदान कर सकता है:

(i) उत्पादन का लक्ष्य

(ii) विक्रय का लक्ष्य

(iii) लाभ की मात्रा

(iv) विनियोजित नीति

(v) कोषों का उपयोग

(vi) नकद कोष सीमा

(vii) श्रमिकों की समस्याएँ

(viii) विपणन एवं विज्ञापन ।

b. बाह्य घटक (External Factors):

ये वे घटक होते हैं जिन पर प्रबन्ध का नियन्त्रण नहीं होता; यह उनके कार्य-क्षेत्र से बाहर होते हैं । व्यावसायिक दशाओं को निश्चित करने वाले घटक इस सीमा के अन्तर्गत आते हैं । यह तत्व सामान्य व्यावसायिक दशाओं का निर्माण करते हैं तथा यह प्रत्येक व्यावसायिक कार्य को प्रभावित करते हैं । अतः यह घटक प्रायः प्रत्येक व्यावसायिक इकाई पर लागू होते हैं ।

इसीलिए इनको वातावरण सम्बन्धी घटक (Environmental Factors) भी कहते हैं । एक व्यावसायिक अर्थशास्त्री को इन घटकों का अध्ययन तथा ध्यान हमेशा रखना चाहिए तथा इनका विश्लेषण कर उनके प्रभावों से सर्वोच्च प्रबन्ध (Top Management) को अवगत कराते रहना चाहिए । अतः नीतियों के निर्धारण में इन तत्वों का समावेश करना अति आवश्यक है ।

बाह्य घटकों में प्रमुख रूप से निम्न का ज्ञान होना आवश्यक है:

(i) विश्वव्यापी, क्षेत्रीय तथा स्थानीय आर्थिक प्रवृत्तियाँ क्या हैं?

(ii) राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का भविष्य कैसा है?

(iii) व्यापार चक्रों की गति क्या होगी?

(iv) नये बाजारों में उत्पादित वस्तुओं की माँग क्या होगी?

(v) सरकार की आर्थिक नीति क्या होगी?

(vi) नियन्त्रण तथा वित्तीय नीति क्या होने जा रही है?

(vii) प्रतियोगिता घटने या बढ़ने की क्या सम्भावनाएँ हैं?

(viii) पूँजी की लागत, ब्याज की दर तथा लाभ-दर बढेगी या घटेगी?

(ix) विदेशी व्यापार के सन्तुलन का क्या प्रभाव होगा?

(x) श्रमिक आन्दोलन का उत्पादन पर क्या प्रभाव होगा?

अतः एक व्यावसायिक अर्थशास्त्री प्रबन्ध को अपने महत्वपूर्ण सुझाव दे सकता है ।


किसी उत्पाद अथवा सेवा को बेचने अथवा प्रवर्तित करने के उद्देश्य से किया जाने वाला जनसंचार विज्ञापन (Advertising) कहलाता है। विज्ञापन विक्रय कला का एक नियंत्रित जनसंचार माध्यम है जिसके द्वारा उपभोक्ता को दृश्य एवं श्रव्य सूचना इस उद्देश्य से प्रदान की जाती है कि वह विज्ञापनकर्ता की इच्छा से विचार सहमति, कार्य अथवा व्यवहार करने लगे।

औद्योगिकीकरण आज विकास का पर्याय बन गया है। उत्पादन बढ़ने के कारण यह आवश्यक हो गया है कि उत्पादित वस्तुआें को उपभोक्ता तक पहुँचाया ही नहीं जाय बल्कि उसे उस वस्तु की जानकारी की दी जाय। वस्तुतः मनुष्य को जिन वस्तुआें की आवश्यकता होती है व उन्हें तलाश ही लेता इसके ठीक विपरीत उसे जिसकी जरूरत नहीं होती वह उसके बारे में सुनकर अपना समय खराब नहीं करना चाहता। इस अर्थ में विज्ञापन वस्तुआें को ऐसे लोगों तक पहुँचाने का कार्य करता है जो यह मान चुके होते है कि उन वस्तुआें की उसे कोई जरूरत नहीं है। आशय यह कि उत्पादित वस्तु को लोकप्रिय बनाने तथा उसकी आवश्यकता महसूस कराने का कार्य विज्ञापन करता है।

विज्ञापन अपने छोटे से संरचना में बहुत कुछ समाये होते है। वह बहुत कम बोलकर भी बहुत कुछ कह जाते है। आज विज्ञापन हमारे जीवन का अहम हिस्सा बन चुका है। सुबह आंख खुलते ही चाय की चुस्की के साथ अखबार में सबसे पहले दृष्टि विज्ञापन पर ही जाती है। घर के बाहर पैर रखते ही हम विज्ञापन की दुनिया से घिर जाते है। चाय की दुकान से लेकर वाहनों और दिवारों तक हर जगह विज्ञापन ही विज्ञापन दिखाई देते हैं।

किसी भी तथ्य को यदि बार-बार लगातार दोहराया जाये तो वह सत्य प्रतीत होने लगता है - यह विचार ही विज्ञापनों का आधारभूत तत्व है। विज्ञापन जानकारी भी प्रदान करते है। उदाहरण के लिए कोई भी वस्तु जब बाजार में आती है, उसके रूप - रंग - सरंचना व गुण की जानकारी विज्ञापनों के माध्यम से ही मिलती है। जिसके कारण ही उपभोक्ता को सही और गलत की पहचान होती है। इसलिए विज्ञापन हमारे लिए जरूरी है।

जहाँ तक उपभोक्ता वस्तुओं का सवाल है, विज्ञापनों का मूल उद्देश्य ग्राहको के अवचेतन मन पर छाप छोड़ जाता है और विज्ञापन इसमें सफल भी होते है। यह 'कहीं पे निगाहें, कही पे निशाना' का सा अन्दाज है।

विज्ञापन सन्देश आमतौर पर प्रायोजकों द्वारा भुगतान किया है और विभिन्न माध्यमों के द्वारा देखा जाता है जैसे समाचार पत्र, पत्रिकाओं, टीवी विज्ञापन, रेडियो विज्ञापन, आउटडोर विज्ञापन, ब्लॉग या वेब्साइट आदि। वाणिज्यिक विज्ञापनदाता अक्सर उपभोक्ताओं के मन में कुछ गुणों के साथ एक उत्पाद का नाम या छवि जोड़ जाते हैं जिसे हम "ब्रान्डिग" कहते है। ब्रान्डिग उत्पाद या सेवा की बिक्री बढाने में एक प्रमुख भूमिका निभाता है। गैर-वाणिज्यिक विज्ञापनों का उपयोग राजनीतिक दल, हित समूह, धार्मिक संगठन और सरकारी एजेंसियाँ करतीं हैं।

2015 में पूरे विश्व में विज्ञापन पर कोई 529 बिलियन अमेरिकी डॉलर खर्च किये जाने का अनुमान है। [1]

अर्थ एवं परिभाषा[संपादित करें]

'विज्ञापन' शब्द 'वि' और 'ज्ञापन' से मिलकर बना है। 'वि' का आभिप्राय 'विशिष्ट' तथा 'ज्ञापन' का आभिप्राय सूचना से है। अतः विज्ञापन का अर्थ 'विशिष्ट सूचना' से है। आधुनिक समाज में 'विज्ञापन' व्यापार को बढ़ाने वाले माध्यम के रूप में जाना जाता है।

विलियम वेलबेकर 
विज्ञापन सूचनाएँ प्रचारित करने का यह साधन है जो कि किसी व्यापारिक केन्द्र अथवा संस्था द्वारा भुगतान प्राप्त तथा हस्ताक्षरित होता है और इस संभावना को विकसित करने की इच्छा रखता है कि जिनके पास यह सूचना पहुँचेगी वे विज्ञापनदाता की इच्छानुसार साचेंगे अथवा व्यवहार करेंगे।
द न्यू एनसाईक्लापीडिया ब्रिटानिकाः
विज्ञापन सम्प्रेषण का यह प्रकार है जो कि उत्पादक अथवा कार्य को उन्नत करने, जनमत को प्रभावित करने, राजनैतिक सहयोग प्राप्त करने, एक विशिष्ट कारण को आगे बढ़ाने अथवा विज्ञापनदाता द्वारा कुछ इच्छित प्रतिक्रियाआें को प्रकाशित करने का उद्देश्य रखता है।'
बृहत हिन्दी कोशः
विज्ञापन के पर्यायवाची के रूप में समझना सूचना देना, इश्तहार, निवेदन करना आदि शब्द दिए गए है।

विज्ञापन के कार्य[संपादित करें]

विज्ञापन के निम्नलिखित कार्य हैंः -

  • 1. नवीन वस्तुआें और सेवाआें की सूचना देना।
  • 2. किसी वस्तु की उपयोगिता एवं श्रेष्ठता बताते हुए उसकी ओर लोगों का ध्यान आकर्षित करना।
  • 3. उपभोक्ताआें में वस्तु के प्रति रुचि तथा विश्वास उत्पन्न करना।
  • 4. उपभोक्ताआें की स्मृति को प्रभावित करना।
  • 5. विशेष छूट आदि की जानकारी देते हुए उपभोक्ता-माँग में वृद्धि करना।
  • 6. वस्तु को स्वीकार करने अपनाने और उसे खरीदने की प्रेरणा देना।
  • 7. विज्ञापन अन्य उत्पाद कम्पनियो के उत्पादनो की तुलनात्मक जानकारी देता है।
  • 8. बाजार में उत्पाद कम्पनियो को स्थिरता प्रदान करता है।

विज्ञापन के प्रकार[संपादित करें]

तमाम आलोचनाआें के होते हुए भी विज्ञापन हमारे जीवन स्तर को सुधारनें तथा उत्पादन बढ़ाने का प्रभावी माध्यम है। आज हम विज्ञापन युग के सीमान्त पर आ खड़े हुए हैं। विज्ञापन को उत्पादित वस्तु बेचने अथवा प्रचारित करने की कला का सीमित उद्देश्य न मानकर जनचेतनायुक्त कलात्मक विज्ञापन को भी प्राथमिकता देनी चाहिए।

वर्तमान समय में विज्ञापन के कोई रूप हमारे सामने आते है। इनको निम्नलिखित प्रकारो में रखा जा सकता है।

अनुनेय विज्ञापन (Persuasive advertisement)[संपादित करें]

विज्ञापन माध्यम से जनता अथवा उपभोक्ता तक पहुंचने उन्हे अपनी ओर आकर्षित करने, रिझाने, उत्पाद की प्रतिष्ठा तथा उसके मूल्य को स्थापित किया जाता है। इस प्रकार के विज्ञापन निर्माता तब प्रसारित करता है, जब उसका उद्देश्य ग्राहकों के मन में अपनी वस्तु का नाम स्थापित करना होता है और यह आशा की जाती है कि ग्राहक उसे खरीदेगा। विज्ञापन विभिन्न माध्यमों के आधार पर विशिष्ट उपभोक्ताआें को अपने उद्देश्य के लिये मनाने की इच्छा रखते है।

सूचनाप्रद विज्ञापन[संपादित करें]

इस प्रकार का विज्ञापन सूचनाआें को प्रसारित करने की एवं व्यापारिक आभिव्यक्ति के रूप में सामने आता है। साथ ही इन विज्ञापनों का उद्ददेश्य जन-साधारण को शिक्षित करना, जीवनस्तर उंचा करना, सांस्कृतिक बौद्धि तथा आध्यात्मिक उन्नति करने का भाव निहित होता है। सामुदायिक विकास सुधार, अंतराट्रीय सद्भाव, वन्य प्राणी रक्षा, यातायात सुरक्षा आदि क्षेत्रों में जन-साधारण की भलाई के उद्देश्य से सूचना प्रदान कर जागरकता उत्पन्न करता है।

सांस्थानिक विज्ञापन[संपादित करें]

सांस्थानिक विज्ञापन व्यावसायिक संस्थानों द्वारा प्रकाशित व प्रचारित कराये जाते है। ग्राहकों में विश्वास आर्जित करने के लिए इस प्रकार के विज्ञापन किये जाते है। संस्थाओं के रूप में बड़े-बड़े उद्योग समूह अंतराष्ट्रीय अथवा राष्ट्रीय स्तर की कंपनियाँ आदि विज्ञापन प्रस्तुत कर राष्ट्रहित संबन्धी जनमत निर्माण करती है। विज्ञापन की विषय-वस्तु नितान्त जन-कल्याण से संबंधित होती है। किन्तु इसमें स्व-विज्ञापन भी निहित होता है।

औद्योगिक विज्ञापन[संपादित करें]

औद्योगिक विज्ञापन कच्चा माल, उपकरण आदि की क्रय में वृद्धि के उद्देश्य से किया जाता है, इस प्रकार के विज्ञापन प्रमुख रूप से औद्योगिक प्रक्रियाआें में प्रमुखता से प्रकाशित किये जाते है, इस प्रकार के विज्ञापनों का प्रमुख उद्देश्य सामान्य व्यक्ति को आकर्षित करना नहीं होता है वरना औद्योगिक क्षेत्र से संबंधित व्यक्तियों, प्रतिष्ठानों तथा निर्माताआें को अपनी ओर आकृष्ट करना होता है।

वित्तीय विज्ञापन[संपादित करें]

वित्तीय विज्ञापन प्रमुख रप से अर्थ से संबंधित होता है, विभिन्न कंपनियों द्वारा अपने शेअर खरीदने का विज्ञापन उपभोक्ताआें को निवेश के लिए प्रोत्साहित करने संबंधित विज्ञापन इसी श्रेणी में आते है, कभी-कभी कंपनी अपनी आय व्यय संबंधित विवरण देने की अपनी आर्थिक स्थिति की सुदृढता को भी विज्ञापित करती है।

वर्गीकृत विज्ञापन[संपादित करें]

इस प्रकार के विज्ञापन अत्याधिक संक्षिप्त सज्जाहीन एवं कम व्ययकारी होते हैं। शोक संवेदना, ज्योतिष विवाह, बधाई, क्रय-विक्रय, आवश्यकता, नौकरी, वर-वधू आदि से संबंधित इस प्रकार के विज्ञापन समाचार पत्र में प्रकाशित होते हैं।

अन्य विज्ञापन[संपादित करें]

उक्त प्रकार के विज्ञापनों के आतिरिक्त कुछ अन्य प्रकार के विज्ञापन भी दृष्टिगत होते है।

  • (अ) सम्मानक विज्ञापन (Prestige Advertisment): लोकमत अथवा जनमत तैयार करने के उद्देश्य से चुनापूर्ण घोषणापत्र विज्ञापित किया जाता है जिसे सम्मानक विज्ञापन की श्रेणी में रखा जाता है।
  • (आ) स्मारिका विज्ञापन (Sovenier Advertisment) : किसी सांस्कृतिक कार्यक्रम समाजसेवी संस्था आदि द्वारा आयोजित कार्यक्रम के अंतर्गत स्मारिका का प्रकाशन किया जाता है जिसमें सामान्य रूप से आधिक सहायता के रूप में विज्ञापन प्रकाशित किये जाते हैं। संस्था का परिचय, संस्था के प्रमुख कार्यक्रम, संस्था के पदाधिकारियों का विवरण आदि के साथ इन विज्ञापनों को भी प्रकाशित किया जाता है।

माध्यम के अनुसार वर्गीकरण[संपादित करें]

विज्ञापन के माध्यम के अनुसार वाणिज्यिक विज्ञापन, मीडिया भितिचित्र, होर्डिंग, सडक फर्नीचर घटकी, मुर्दित और रैक कार्ड, रेडियो, सिनेमा और टेलीविजन स्क्रीन, शॅपिंग कार्ट, वेब, बस स्टाप, बेंच आदि का शामिल कर सकते है।

टेलीविजन विज्ञापन

एक ताजा अध्ययन बताता है कि सभी विज्ञापनों में अभी भी टेलीविजन विज्ञापन सबसे प्रभावी विज्ञापन का तरीका है। इस वाक्य का साभित हम देख सकते है जब लोकप्रिय घटनाओं के दौरान टेलीविजन चैनलों वाणिज्यिक समय के लिये उच्च कीमतों चार्ज करते है। संयुक्त राज्य अमेरिका में वार्षक "सूपर बाउल" फुटबाल खेल टेलीविजन पर सबसे प्रमुख विज्ञापन घटना के रूप में जाना जाता है।

रेडियो विज्ञापन

रेडियो विज्ञापनों का प्रसारित ट्रांसमीटर एवं एंटीना नामक यंंत्रों द्वारा किया जाता है। एयरटाइम विज्ञापनों के प्रसारण के लिये विदेशी मुद्रा में एक स्टेशन या नेटवर्क से खरीदा जाता है। "आर्बिट्रान" नामक संस्थान के अनुसार अमेरिका के ९३% जनसंख्या रेडियो का इस्तेमाल करती है।

ऑनलाइन विज्ञापन

ऑनलाइन विज्ञापन ग्राहकों को आकर्षित करने के लिये इंटरनेट और वर्ल्ड वाइड वेब का उपयोग करते है। ऑनलाइन विज्ञापन एक विज्ञापन सर्वर द्वारा वितरित का उदाहरण, खोज इंजन परिणाम प्रष्ठों पर दिखाई देते हैं।

छाप विज्ञापन

जो विज्ञापन समाचार पत्रों, पत्रिका, व्यापार पत्रिका में प्रकाशित किया जाता है, उसे हम छाप विज्ञापन कहते हैं। छाप विज्ञापन का पहला प्रपत्र वर्गीक्रुत विज्ञापन है। छाप विज्ञापन का दूसरा प्रपत्र प्रदर्शन विज्ञापन है। प्रदर्शन विज्ञापन में एक बड़ा विज्ञापन में एक बड़ा विज्ञापन को अखबार का एक लेख का रूप दिया जाता है।

बिलबोर्ड विज्ञापन

बिलबोर्ड बड़े बोर्ड हैं जिनका उपयोग सार्वजनिक स्थानों किया जाता है। प्रायः बिलबोर्ड मुख्य सडकों के किनारे लगाये जाते हैं।

दुकान में विज्ञापन

जो विज्ञापन दुकानों के अंदर स्थापित किया जाता है उसे हम दुकान में विज्ञापन या "इन स्टोर" विज्ञापन कहते है।

हवाई विज्ञापन

विमान, हवाई गुब्बारा द्वारा प्रकाशित किये विज्ञापनों को हम हवाई विज्ञापन कहते हैं।

विज्ञापन के गुण[संपादित करें]

विज्ञापन उत्पाद वस्तु के प्रति लोगों का ध्यान आकर्षित करने का कार्य करते हैं। एक अच्छे विज्ञापन में निम्नलिखित गुण/विशेषताएँ होनी चाहिएः -

विज्ञापन में ध्यान आकर्षित करने की क्षमता हो

किसी भी विज्ञापन की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि वह लोगों का (विशेष रूप से जिनसे उसका संबन्ध हो) ध्यान आकर्षित करे। विज्ञापन की प्रस्तुति, भाषा और स्थान ऐसा होना चाहिए जिससे लोगों की दृष्टि उस पर अवश्य पड़े। ऐसा न होने पर वह अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पाएगा।

अभिनव एवं मौलिक साज-सज्जा

पत्र-पत्रिकाआें में प्रकाशित विज्ञापन हों अथवा होर्डिंग आदि के माध्यम से प्रस्तुत, उसकी साज-सज्जा इतनी मौलिक होनी चाहिए कि वह अपनी ओर लोगों की दृष्टि अपने-आप खींच ले। सामान्य से अलग कुछ विशेष आकर्षण होना विज्ञापन की शर्तं है।

विज्ञापित वस्तु की मुख्य विशेषता पर बल हो

जिस उत्पाद अथवा वस्तु को विज्ञापित किया जा रहा है उसकी मुख्य विशेषता विज्ञापन में होनी चाहिए जिससे लोगों में उसके प्रति धारणा स्थापित करनें में रुकावट न पैदा हो। मुख्य बातें या केन्द्रिय बिंदु को आधार बनाकर विज्ञापन आधिक तर्कसंगत तथा प्रभावी बनाया जा सकता है।

विज्ञापन में सुबोधता हो

विज्ञापन बनाने वाली एजेंसी को चाहिए कि वह ऐसा विज्ञापन तैयार करे जो पढ़े-लिखे तथा अनपढ़, शहरी तथा गाँव, सभी के लिए सुबोध हो। जिस विज्ञापन को समझने में दर्शक को दिमाग लगाना पड़ेगा उसके प्रति वह जुड़ाव महसूस नहीं कर पाएगा। ऐसी स्थिती में जब लोग उसे समझ ही नहीं पाएँगे, उत्पाद को उपयोग में लाने की ओर कदम कैसे बढ़ाऐेंगे?

तथ्यों की तर्कपूर्ण प्रस्तुति

विज्ञापनदाता को चाहिए कि वह जिस उत्पाद को विज्ञापित करना चाहता है उससे जुड़े तमाम तथ्यों को क्रमवार प्रस्तुत करे। वस्तुतः विज्ञापन को बनाने की आवश्यकता ही इसलिए महसूस की गयी कि जिसे जरुरत न हो वह भी उसके प्रति आकर्षित हो। तथ्यों की तर्कपूर्ण प्रस्तुति से लोग विज्ञापन के प्रति खुलापन महसूस करते हैं।

गतिशीलता

विज्ञापन में यह गुण होना चाहिए कि वह स्थिर होते हुए भी देखने अथवा पढ़ने वाले की सोच को गति प्रदान करे। इसके लिए उसमें गत्यात्मक संकेत होने आवश्यक हैं, जिससे विज्ञापन जहाँ समाप्त हो, देखने वाला उसके आगे को सोचकर उसके उपयोग के लिए अपना मन बनाए।

शीर्षक आकर्षक हो

विज्ञापन का शीर्षक आकर्षक होना चाहिए। वैसे चित्रात्मक विज्ञापन के लिए शीर्षक की आवश्यकता कम होती है फिर भी जहाँ आवश्यकता हो शीर्षक देने से परहेज नहीं करना चाहिए। उदाहरणस्करप 'अतुल्य भारत' आदि। इससे विज्ञापन के विषय का ज्ञान हो जाता है।

रुचिकर तथा मनोहारी

विज्ञापन के माध्यम से कम से कम समय में उत्पाद की जानकारी दी जाती है। लोगों के व्यस्त समय में से एक क्षण चुराकर विज्ञापन को उनके सामने प्रदर्शित किया जाता है। ऐसे में विज्ञापन यदि रुचिकर नहीं होगा तो अपने अन्य कामों में लगा हुआ व्यक्ति उसकी ओर ध्यान नहीं दे पाएगा। इसलिए यह आवश्यक है कि उत्पाद का उपयोग करने वालों तथा विज्ञापन देखने वाले दोनों की रुचि का ख्याल रखा जाय।

विज्ञापन का महत्व[संपादित करें]

आज तकनीकी विकास ने पूरे विश्व के लोगों को एक-दूसरे के नजदीक ला दिया है। दूरियों का कोई मतलब नहीं रह गया है। इन सब कारणों ने मनुष्य को और आधिक महत्वाकांक्षी बना दिया है। वर्तमान समय के बाजार प्रधान समाज में उपभोक्तावादी संस्कृति का बोलबाला बढ़ रहा है। ऐसे में उपभोक्ता, समाज और उत्पादन के बीच संबन्ध स्थापित करने का कार्य विज्ञापन कर रहा है। उत्पादक के लाभ से उपभोक्ता की इच्छाआें की पूर्ति तथा उत्पादित वस्तु के उपयोग का मार्ग प्रशस्त करने का कार्य विज्ञापन को पहचान प्रदान करता है। ऐसे में विज्ञापन का महत्व सर्वसिद्ध है। विज्ञापन के महत्व को रेखांकित करते हुए ब्रिटेने के पूर्व प्रधानमंत्री विलियम ग्लेडस्टोन ने कभी कहा था - व्यवसाय में विज्ञापन का वही महत्व है जो उद्योगक्षेत्र में बाष्पशक्ति के आविष्कार का। विस्टन चर्चिल ने इसकी आर्थिक उपयोगिता के महत्व को प्रतिपालित करते हुए कहा था - टकसाल के आतिरिक्त कोई भी बिना विज्ञापन के मुद्रा का उत्पादन नहीं कर सकता।

विज्ञापन के महत्व को हम निम्नलिखित रप में प्रस्तुत कर सकते है-

उत्पादित वस्तु की जानकारी

उद्योगों के माध्यम से नयी-नयी वस्तुआें का उत्पादन होता है ओर विज्ञापन से इन नवीन उत्पदों की जानकारी दी जाती है। सामान्य रप से उपभोक्ता अथवा जनता पारंपारिक रप से जिस वस्तु का उपयोग करती आयी है उसे छोड़कर नयी वस्तु के प्रति उसमें संदेह बना रहता है। विज्ञापन के माध्यम से उपभोक्ता में उत्पादित नयी वस्तु के प्रति रुचि पैदा की जाती है। केवल वस्तु ही नहीं, उत्पादनकर्ता, वस्तु की उपयोगिता तथा उसके गुणों की जानकारी देने का कार्यभी विज्ञापन करता है। इस तरह उपभोक्ता के पास एक जैसी वस्तुआें की तुलना, उनके मूल्यों का अन्तर आदि का विकल्प विज्ञापन के माध्यम से उपलब्ध होता है और वह अपनी सुविधा से अपने उपयोग की वस्तु का चयन कर उसे खरीदता है।

विक्रेता का लाभ

विज्ञापन से केवल उपभोक्ता का ही लाभ नहीं प्राप्त होता बल्कि उसे बेचने वाले दुकानदार अर्थात विक्रेता को भी लाभ प्राप्त होता है। विज्ञापन विक्रेता काम इतना आसान कर देता है कि उसे नयी वस्तु के बारे में उपभोक्ताआें को बार-बार बताना नहीं पड़ता है। सच्चाई तो यह है कि विज्ञापन वस्तु के साथ ही साथ वह कहाँ-कहाँ उपलब्ध है, इसकी जानकारी मुहैया कराता है। अतः विज्ञापन से उपभोक्ता तथा विक्रेता दोनों को लाभ मिलता है।

बाजार का निर्माण

विज्ञापन के माध्यम से नयी वस्तुआें के उत्पादन तथा उसकी उपयोगिता की जानकारी दी जाती है जिससे उपभोक्ताआें का ध्यान उस वस्तु के इस्तेमाल की ओर केन्द्रित होता है। इस प्रकार विज्ञापन बाजार का निर्माण करता है। आज हम देखते है कि कल तक जहाँ पहुँचना दुर्गम माना जाता था वहाँ भी लोगों की भीड़ पहुँच गई है। लोग अपने रहने के स्थान पर ही बाजार बनाते रहे हैं। पहले लोग किसी विशेष दिन समय निकालकर बाजार जाते थे, अब बाजार स्वयं उनके पास आ गया है। यह सब विज्ञापन के कारण ही संभव हो पाया है।

राष्ट्रहित

विज्ञापन का योगदान राष्ट्रसेवा के लिए भी कम नहीं है। उत्पादन के प्रति लोगों को जागरक बनाकर विज्ञापन देश की अर्थव्यवस्था के विकास में विशेष सहयोग प्रदान करता है। इतना ही नहीं राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों, अन्तरराट्रीय समझौतों आदि को पारदर्शी रूप में प्रस्तुत कर विज्ञापनों ने पूरे वैश्विक परिदृश्य के हित का कार्य किया है। आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, ऐतिहासिक मुद्दों के विज्ञापनों के द्वारा किसी भी देश के विचारों उसकी संस्कृति तथा विकासात्मक स्थिति को प्रस्तुत कर उनके कल्याणकारी कार्यो को जनता के बीच ले जाना भी राष्ट्रपति का कार्य है।

मनोरंजन के लिए उपयोगी

विज्ञापन की रंग योजना, महिलाआें के भड़कीले चित्र, शब्द योजना, अश्लील चित्रों का प्रयोग, आकर्षक शैली इससे उपभोक्ताआें का मनोरंजन भी होता है। फिल्मों के प्रचार-प्रसार में विज्ञापन का अत्याधिक प्रयोग किया जाता है। फिल्म मनोरंजन का सबसे बड़ा माध्यम है।

जीवनस्तर को ऊँचा करने में सहायक

समाज कल्याण संबंधी प्रतिष्ठानों के विज्ञापनों का एक मात्र ध्येय जनता में विवेकशीलता उत्पन्न करना, उनको जीवनस्तर को ऊँचा करना, बौद्धिक तथा अध्यात्मिक विकास करना आदि रहा है। मुख्यतः विज्ञापन एक मार्ग लक्ष्य उत्पाद के संदर्भ में विश्वास पैदा करना उन्हें लेने के लिए मजबूर करना, उपभोक्ताआें के दिलों दिमाग पर छाप छोड़ना आदि से उपभोक्ता वस्तुआें की खरीदीकर सके। सर्व शिक्षा आभियान, नारी सशक्तिकरण आदि विज्ञापनों द्वारा लोग शिक्षा एवं नारी के विकास को अच्छे ढंग से समझ सकें हैं।

विज्ञापन और हिन्दी[संपादित करें]

विज्ञापन का क्षेत्र पूरी तरह से व्यावसायिक है। उसका कार्य तथा उपयोगिता व्यावसायिक लाभ से ही संबन्धित है। हिन्दी भारत में सबसे ज्यादा लोगों द्वारा बोली तथा समझने वाली भाषा है। इस अर्थ में विज्ञापन के माध्यम के रप में सबसे महत्वपूर्ण हिन्दी भाषा है। विज्ञापन के विषय अथवा उत्पादित वस्तुआें के गुण तथा उसकी प्रस्तुति के आधार पर उसकी आन्तरिक एवं बाही आवश्यकताआें के अनुरप भाषा की जरुरत होती है। आज हिन्दी विज्ञापन की आवश्यकता के अनुरूप नया रूप ग्रहण कर रही है। विज्ञापन के अनुसार हिन्दी भाषा में नित-नये प्रयोग हो रहे है।इससे भाषा का विकास हो रहा है और हिन्दी मात्र पुस्तकों की भाषा न होकर नए समय और समाज की जीवंत भाषा बनती हा रही है।

प्रत्येक भाषा की अपनी भाषा संस्कृति होती है। उसकी शब्दावली, वाक्य रचना, मुहावरे आदि विशेष होते है। हिन्दी का भी अपना भाषा संस्कार है। विज्ञापन के वर्तमान रूप में पारंपारिकता के त्याग तथा आधुनिकता के स्वीकार की स्थिती देखी जा सकती है। उसमें केवल उत्पादक, उत्पादित वस्तु और उपभोक्ता ही नहीं आता, बल्कि जनसंचार के सभी माध्यम और यातायत के साधन भी आते हैं, ये सभी विज्ञापन के प्रसार में सहायक होते है।

हिन्दी के क्रियापदों के प्रयोग से विज्ञापनों में आधिक कह देने की क्षमता पैदा होती है। बिकाऊ है, जररत है, चाहते हो, आते हैं, जाते हैं, आइए जैसे शब्दों के प्रयोग से विज्ञापनों की अर्थवत्ता बढ़ती है। पत्र-पत्रिकाआें जैसे मुद्रित विज्ञापनों में प्रयोग की जानेवाली हिन्दी-शब्दावली माध्यम के परिवर्तन के साथ बदल जाती है। रेडियों में जहाँ ध्वन्यात्मक शब्दों का महत्व होता है वहीं टेलिविजन तथा सिनेमा में दृश्यात्मक क्रियापदों का प्रयोग किया जाता है। उदाहरण के लिए यदि मुद्रित रूप में ठंढी के दिनों में त्वचा को मुलायम रखने के लिए ’बोरोलीन लगाइए' जैसा विज्ञापन छपता है तो रेडियो के लिए - 'ठंढी की खुश्की दूर करे बोरोलीन' जैसे शब्द प्रयोग किए जाएँगे, लेकिन दूरदर्शन और दृक्-श्रव्य माध्यमों में दृश्यात्मक पदों जैसे ’देखा आपने? जाना आपने ?' आदि शब्दों का प्रयोग किया जाता है।

विज्ञापन की आलोचना[संपादित करें]

विज्ञापन को आर्थिक विकास के लिये देखा जा सकता है, कई लोग विज्ञापनों के सामाजिक लगत पर भी ध्यान देना चाहते है। इस आलोचन का प्रमुख उदाहरण इन्टरनेट विज्ञापन है। इन्टरनेट विज्ञापनों स्पेम जैसे रूपों में आकर कंप्यूटर को क्शति करते है। विज्ञापनों को अधिक आकर्षक बनाके, एक उपभोकता की इच्छाओं का शोषण कराता है।

विनियमन[संपादित करें]

जनता के हित की रक्शा के प्रयासों का ध्यान देने के लिये विज्ञापनों का विनियमन की गैइ है। उदाहरण: स्वीडिश सरकार १९९१ में टेलिविशन पर तंबाकू विज्ञापनों पर प्रतिबन्ध लगाया गया है। अमेरिका में कैइ समुदायों का मानना है कि आउटडोर विज्ञापन बाहर सुन्दरता को नष्ट करते है।

संकेतिकता:[संपादित करें]

उपभोक्ताओं और बाजार के बीच दर्शाती संकेतो और प्रतीकोंं रोजमर्रा की वस्तूओं में इनकोड किय गया है। विज्ञापन में कैइ छिपा चिन्ह और ब्रांड नाम के भीतर अर्ध, लोगो, पैकेज डिजाइन, प्रिन्ट विज्ञापन और टीवी विज्ञापन है। अध्ययन और सन्देश की व्याख्या करने के लिये सान्केतिकता का उपयोग करते है। लोगों और विज्ञापनों दो स्तरों पर व्याख्या की जा सकती है: १) सतह के स्तर और २) अंतर्निहित स्तर

१) सतह के स्तर को अपने उत्पाद के लिये एक छवि या व्यक्तित्व बनाने के लिये रचनात्मक सन्केत का उपयोग करता है। ये सन्केत छवियों, शब्द, रंग या नारी ही सकता है।

२) अंतर्निहित स्तर छिपा अर्थ से बना है। छवियों का सन्योजन, शब्द, रंग और नारा दर्शकों या उपभोकता द्वारा व्याख्या की जानी चाहीये। लिंग के सांकेतिका बहुत महत्त्वपूर्ण है। विपणन सन्चार के दो प्रकार होते है: उदेशय और व्यक्तिपरक।

विज्ञापनो में, पुरुषों स्वतन्त्र रूप में प्रतिनिधित्व किया जाता है।

विज्ञापन में परिवार:[संपादित करें]

परीवारों का उपयोग विज्ञापन में एक प्रमुख प्रतीक बन गया है और मुनाफा बढाने के लिये विपणन अभियानों में उपयोग किय जाता है।

विज्ञापन में परिवार के सदस्य[संपादित करें]

१) बीवी- पुराने जमाने में एक बीवी का अवतार सिर्फ एक घरवाली के रूप में दिख सखति थी। आजकल, लोगों के सोचविचार बदल चुका है, एक बीवी का उपयोग हर जगह में जरूरी है। एर्टेल के नैइ टेलिविशन विज्ञापन में बिवी को कंपनी में अप्ने पति से बड़ा सथान निभा रही है।

२) पति- विज्ञापनों में एक पती घर के बाहर काम के प्रदर्शन और परिवार के वित्त का ख्याल रखने के रूप में दिखाई देता है।

३) माता-पिता- इतिहास के दौरान माताओं के बच्चों की प्राथमिक शारीरिक देखबाल करने वालों के रूप में चित्रित किया गया है। शारीरिक देखबाल ऐसे स्तनपान और बदलते डायपर के रूप में कार्य भी शामिल है।

विज्ञापन रचना-प्रक्रिया[संपादित करें]

विज्ञापन तैयार करने से पहले उद्यमी के दिमाग में यह बात स्पष्ट होती है कि उसका उपभोक्ता कौन है? और अपने विज्ञापनों में उद्यमी /विज्ञापन एजेंसी उसी उपभोक्ता समूह को सम्बोधित करती है। उस समूह की रूचि, आदतों एवं महत्वाकांक्षाओं को लक्ष्य करके ही विज्ञापन की भाषा, चित्र एवं अखबार, पत्रिकाओं, सम्प्रेषण माध्यमों का चुनाव किया जाता है। उदाहरणार्थ - यदि कोई उद्यमी महिलाओं के लिए कोई वस्तु तैयार करता है तो उसकी शैली निम्न बातों के आधार पर निर्धारित होगी -

उपभोक्ता समूह - महिलाएँ

आर्थिक - मध्यम/ निम्न/ उच्च

शैक्षिक स्तर - साधारण/ उच्च

अपनी सलोनी त्वचा के लिए मैं कोई ऐसी- वैसी क्रीम इस्तेमाल नहीं करती।

(अब ये पंक्ति अति साधारण है, परन्तु उसमें कई छिपे अर्थ निहित है। अपनी सलोनी त्वचा के माध्यम से बेहतर दिखने की महत्वाकांक्षा को उभारा गया है, जबकि ऐसी - वैसी शब्द से भय उत्पन्न करता है कि सस्ती क्रीम निश्चय ही त्वचा के लिए हानिकारक होगी।)

यदि वस्तु की खरीददार मध्यम श्रेणी की महिलाएं हो तो विज्ञापन फुसफुसायेगा -

जिसका था आपको इंतजार............एक क्रीम जो आपकी त्वचा को कमनीय बनाये। ..... आपके पति आपको देखते रह जायें.....................

(जिसका आपको इंतजार था, यानी महंगी क्रीम आप चाहते हुए भी खरीद नहीं सकती हैं, परन्तु ये क्रीम आपकी पहंच में है।

ये ख्याल में रखकर कि अधिकांश निम्न मध्यम वर्ग की महिलाएँ घर में ही सिमटी होती हैं, पति का उल्लेख भी है।

यदि उपभोक्ता समूह निम्न आर्थिक वर्ग का हो तो विज्ञापन कुछ यूँ बात करेगा -

ये सस्ती और श्रेष्ठ है, इसीलिये तो राधा, माया, बसन्ती भी इसे इस्तेमाल करती है।

(लोग संस्ता माल चाहते हैं, घटिया माल कदापि नहीं। अतः श्रेष्ठ बताकर यह प्रकट किया गया कि यह ऐसी - वैसी नहीं है।

राधा-माया- बसन्ती इत्यादि नामों का उल्लेख यह सिद्ध करने के लिए किया गया है कि इस वर्ग के अन्य लोग भी इसे इस्तेमाल करते है, यानी कि यह एक अपनायी गयी एवं स्वीकृत वस्तु है।)

विजुअल्स/ चित्रांकन[संपादित करें]

भाषा एवं शैली ही नहीं, अपितु विजुअल्स या चित्राकंन भी विज्ञापन का महत्वपूर्ण अंग है। ये चित्र, ग्राफ्स इत्यादि भाषा के प्रभाव को और भी प्रबलता प्रदान करते है। ये सब भी उपभोक्ता समूह को मद्देनजर रखकर ही तैयार किये जाते है।

उदाहरण स्वरूप यदि काँलेज के विद्यार्थियों के लिए कोई वस्तु तैयार की गई है तो चुस्त- फुर्त युवक - युवतियों का समूह विज्ञापन में दर्शाया जायेगा या फिर एक खूबसूरत युवती को निहारते युवक दिखाये जायेंगे। .................. और स्लोगन धीमे से फुसफुसायेगा आपको कानों में -

जिसने भी देखा.......................देखता ही रह गया।............

एक युवक बाईक पर सवार उसे देखकर .................मुग्ध नवयौवनाएँ।

(विज्ञापन की कापी कहेगी............राजेश काँलेज का हीरा है।..............अब और कुछ कहा नहीं जा रहा है, परन्तु यह सुझाया जा रहा है कि बाईक महाविद्यालय में लोकप्रियता बढाती है।)

एक मशीनी चीता तेज रफ्तार से दौडते हुए आता है। उस पर बैठा व्यक्ति उसको नियंत्रित करता है। चीता एक बाईक में बदल गया।.................

(जो सुझाव है, वे इस तरह है।............ चीता रफ्तार का प्रतीक है, यानी ये बाईक तेज रफ्तार से दौड सकती है। मशीनी चीते की जटिलता उस उच्च तकनीक को प्रगट करती है, जिसके माध्यम से बाईक तैयार की गई। चीता शाक्ति का प्रतीक है।....... अतः यह मनुष्य की परिस्थितियों को नियंत्रित करने की इच्छा को उभारता है। सुझाव यह है कि एक शक्तिशाली बाईक को नियंत्रित करने वाला युवक अपने पौरूष को अभिव्यक्त करता है।)

अब आप समझ सकते हैं कि भाषा एवं चित्रों का यह गठबन्धन उपभोक्ताओं पर कितना गहरा असर डाल सकने में सक्षम है। ये श्रोताओं के मन में दबी - छुपी इच्छाओं को उभारते है। यही कारण है कि उपभोक्ता जब वस्तुएँ खरीदता है, तब वह सिर्फ पैकिंग में लिपटा माल ही नहीं खरीदता, अपितु अपनी प्रसुप्त इच्छाओं की पूर्ति भी करता है।

कोई महिला जब लक्स साबुन खरीदती है, तब वह सिर्फ स्नान के लिए साबुन नहीं क्रय करती है, अपितु फिल्म अभिनेत्रियों का सा- सौन्दर्य पाने की जो आकांक्षा है, उसकी कीमत भी अदा करती है। (क्राउनींग ग्लोरी की डिम्पल, सिन्थाल के साथ विनोद खन्ना भी इन्ही आकांक्षाओं को उभारने का साधन है)।

इस तरह एक छोटा सा विज्ञापन बहुत बडी ताकत अपने आप में छिपाये होता है। यह एक लक्ष्य को निर्धारित कर शुरू होता है। और चुपके से अपनी बात कह जाता है। विज्ञापन का मूल उद्देश्य किसी वस्तु विशेष को क्रय करने का सुझाव देना है। विज्ञापन कभी सिर पर चोट नहीं करता, वह तो हमारी पीठ में कोहनी मारता है। वह भाषा, शैली, ध्वनि, चित्र, प्रकाश के माध्यम से हमारे अवचेतन से बतियाता है। विज्ञापन सुझाव ऐसे देता है -

मैं सिन्थाल इस्तेमाल करता हूँ। (क्या आप करते है?)

हमको बिन्नीज माँगता (आपको क्या मांगता?)

फेना ही लेना।

जल्दी कीजिये.................सिर्फ तारीख तक।

कोई भी चलेगा मत कहिये .........................मांगिये।

विज्ञापन बार-बार वस्तु के नाम का उललेख करता है, जिससे कि उनका नाम आपको याद हो जाये। जब आप दुकान पर जाते है तो कुछ यूँ होता है।...........

आप कहते है साबुन दीजिये........

दुकानदार: कौन सा चाहिये, बहनजी?

बस यही वक्त है, जब आपके अवचेतन में पडे़ विज्ञापन अपना खेल खेलते हैं, वे कहते है।...............कोई भी चलेगा मत कहिये ............. क ख ग ही मांगिये।

या

मैं सिन्थाल इस्तेमाल करता हूँ - विनोद खन्ना

बरसों से फिल्म अभिनेत्रियँ लक्स इस्तेमाल करती है।

जो विज्ञापन आपकी प्रसुप्त इच्छाओं को पूरा करता है, वह बाजी मार जाता है।

सम्प्रेषण की कला[संपादित करें]

यह स्पष्ट है कि विज्ञापन प्रतीकों के माध्यम से अपनी बात कहता है। वह कभी हास्य के माध्यम से, कभी लय के माध्यम से, कभी -कभी भय उत्पन्न करके भी अपने लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयत्न करता है। विज्ञापन की कलात्मकता एवं सृजनात्मकता इस बात में निहित है कि यह परिस्थितियों को नये नजरिये से देखने की कोशिश करता है।

जिस तरह एक कवि बिम्बों के माध्यम से अपनी भावनाऒं को अभिव्यक्त करता है। उसी प्रकार एक विज्ञापन भी प्रतिकात्मक रूप से मानवीय इच्छाओं, भावनाओं एवं कामनाओं का स्पर्श करता है।

फूल सौन्दर्य और प्रेम के प्रतीक बन जाते हैं (जय साबून) तो दूसरी ओर हरे रंग का शैतान मनुष्य की ईष्र्या को व्यक्त करता है (ओनिडा)।

सोचिये[संपादित करें]

  • किस वर्ग को विज्ञापन सम्बोधित कर रहा है?
  • उसका भाषा एवं शैली क्या है?
  • कौन से शब्द हैं, जो सुझाव दे रहे हैं?
  • विज्ञान की चित्र एवं रंग व्यवस्था कैसी है?
  • ये चित्र एवं रगं क्या अभिव्यक्त करना चाहते है?
  • ध्वनि, लय एवं प्रकाश की कलात्मकता एवं उनमें निहित अर्थ को ग्रहण कीजियें।

इस तरह आप विज्ञापन का अन्दाज समझने लगेंगे। विज्ञापन फिर आपको बहका नहीं पायेंगे, अपितु अपने आसपास के परिदृश्य एवं मानव मन की आपकी समझ भी गहरी होगी। विज्ञापन सम्प्रेषण की एक संपूर्ण कला है।

सन्दर्भ[संपादित करें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

400000000 ही विज्ञापन (टाइम्स स्क्वायर)

Leave a Comment

(0 Comments)

Your email address will not be published. Required fields are marked *